मेकोंग नदी का आकर्षक डेल्टा मन को भाया

-वियतनाम के बहादुर सैनिकों की देशभक्ति को सलाम
-वियतनाम की सात दिवसीय यादगार यात्रा सानंद सम्पन्न
वियतनाम यात्रा संस्मरण -(3)
– डाॅ. चन्दर सोनाने
हम 50 सहयात्रियों का समूह 20 से 26 अप्रैल 2025 के बीच सात दिन की वियतनाम की यात्रा कर रहे थे। हमारी यात्रा छठें दिन में प्रवेश कर रही थी। इस यात्रा के छठें दिन 25 अप्रैल को सुबह नाश्ता कर हम सब वियतनाम के प्रसिद्ध मेकोंग नदी के डेल्टा देखने के लिए बस से निकले। नदी के तट पर पहुंचकर 2 फैरी बोट से 3 अलग-अलग और आकर्षक डेल्टा देखने निकले।
मेकांग डेल्टा दक्षिण-पश्चिमी वियतनाम का एक प्रमुख क्षेत्र है, जहाँ मेकांग नदी कई शाखाओं में बंटकर समुद्र में मिलती है। इसे वियतनाम का चावल का कटोरा भी कहा जाता है। यह क्षेत्र लगभग 40,500 वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैला हुआ है। यहाँ जमीन से ज्यादा पानी, नहरे और नदियाँ दिखाई देती हैं। उपजाऊ मिट्टी के कारण यहाँ भारी मात्रा में चावल, फल और सब्जियाँ उगाई जाती हैं। यह क्षेत्र वियतनाम की कृषि और मछली पालन का मुख्य केंद्र है। इस डेल्टा की सबसे बड़ी पहचान यहाँ के तैरते हुए बाजार हैं, जहाँ नाविक नावों पर ही सामान बेचते और खरीदते हैं।
तीन डेल्टा के अद्भूत नजारे
यहाँ के ग्रामीणों ने अपने बुद्धि कौशल से इन डेल्टाओं को आकर्षक पर्यटक स्थल के रूप में विकसित कर दिया है। जब हम पहले डेल्टा में पहुंचे तो वहां नारियल के विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाते हुए हमें दिखाया गया। यहां उन्होंने नारियल से चाॅकलेट, पापड़, कैंडी आदि बनाते हुए दिखाया और फ्री में चखाया भी है। सबने चखे और उनका स्वाद सबको पसंद आया। कुछ लोगों ने अपनी पसंद से कुछ खरीदा भी।
सर्प सुरा
इस डेल्टा पर वहां की उपज के अनुसार बहुत सारी विभिन्न स्वाद की सामग्री भी बिक्री के लिए रखी थी। इसमें सबसे आश्चर्यचकित करने वाली मिली स्नेक वाईन यानी सर्पसुरा। हममें से एक ने उसका आनन्द लिया तो वह कुछ देर के लिए वह उसके नशे के आगोश में रहा। इसी के साथ विभिन्न काँच के जारों में झिंगा, मेंढ़क, केकड़ा, साँप आदि भी विक्रय के लिए रखे थे। इन्हें देखकर हम सब आश्चर्यचकित हो गए, किन्तु वहां के लोगों के लिए वह सब सामान्य था।
वियतनामी लोकगीत का लिया आनन्द
पहले डेल्टा से हम दूसरे डेल्टा को देखने के लिए छोटी-छोटी नांव से निकले। एक लंबी नांव में 4-4 यात्रियों को बैठाया गया। नाविक हमें एक सकड़े रास्ते से एक लंबी यात्रा पर लेकर निकला। इस सकड़ी नदी की गली के दोनों ओर झाड़ियों और वृक्षों के झुरमुट थे, जो अत्यन्त आकर्षक लग रहे थे। नांव से करीब 2 किलोमीटर चलकर हम दूसरे डेल्टा पहुंचे। यहां हम सबने यात्रियों को बैठाकर फ्रुट सलाद पाईनापल, अमरूद, संतरा, मौसंबी, तरबूज आदि को छिलकर आकर्षक रूप से तस्करी में पेश किया था। सबने मनभर खाया। वहीं पर हमें दो वियतनामी युवतियों ने मधुर लोकगीत भी सुनाया। लोकगीत के बोल समझ में नहीं आने के बावजूद उसकी मधुरता ने हमारा मन मोह लिया।
वृक्षों की छाया में दोपहर भोजन
वहां से इलेक्ट्रिक कार्ट से हम सब सहयात्री तीसरे डेल्टा की ओर नांव से ही निकले। यहां छायादार वृक्षों की छाया में हमारे लिए दोपहर भोजन की व्यवस्था की गई थी। विभिन्न प्रकार का स्वादिष्ट शाकाहारी भोजन हमने किया। भोजन के बाद थोड़ी देर वहां रूकने के बाद हम यात्रियों में से अधिकतर महिलाओं ने वहां स्थानीय सामग्री की खरीदी की। शाम को फैरी बोट से ही हम वापस दूसरे किनारे पहुंचे। यहां से बस द्वारा दो घंटे के सफर के बाद हम वापस हो चि मिन्ह सिटी के होटल आ गए। यहां रात्रि भोजन कर सब विश्राम के लिए चले गए।
तीन मंजिली कू ची टनल
यात्रा के सातवें और अंतिम दिन 26 अप्रैल को हम सब हो चि मिन्ह सिटी की होटल से नाश्ता कर सुबह 7.30 बजे लाबी में आ गए। सभी यात्री समय पर आ गए थे। एक तरह से सभी ने समय की लाज रख ली थी। सबको समय पर आया देखकर जहां आलू बहुत खुश हुआ, वहीं हम सबको समय का पालन करने का बहुत संतोष भी हुआ। यहां से हम सब 70 किलोमीटर दूर कू ची टनल देखने निकले। इस कू ची टनल वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी से लगभग 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक बेहद विशाल और ऐतिहासिक भूमिगत सुरंगों का नेटवर्क है। यह सुरंगें वियतनाम युद्ध के दौरान उत्तरी वियतनामी सैनिकों का मुख्य गढ़ और रहने का ठिकाना थीं। आज यह वियतनाम का एक बहुत ही लोकप्रिय, ऐतिहासिक और पर्यटन स्थल है। इन सुरंगों की शुरुआत 1940 के दशक में फ्रांसीसी शासन के खिलाफ संघर्ष के दौरान हुई थी। बाद में 1960 के दशक में अमेरिकी सेना के खिलाफ युद्ध के दौरान इसे बहुत बड़ा रूप दे दिया गया। इस पूरी टनल को केवल साधारण औजारों, कुदाल, टोकरी और नंगे हाथों से खोदा गया था। यह पूरा अंडरग्राउंड नेटवर्क लगभग 250 किलोमीटर से ज्यादा लंबा फैला हुआ है। यह सुरंगें मिट्टी के अंदर 3 अलग-अलग स्तरों पर बनी हैं, जो जमीन से 3 मीटर से लेकर 12 मीटर की गहराई तक जाती हैं। यह केवल छिपने की जगह नहीं थी, बल्कि जमीन के नीचे एक पूरा शहर बसा हुआ था। इसमें सैनिकों के रहने के कमरे, रसोईघर, अस्पताल, हथियार डिपो, कॉन्फ्रेंस रूम और कमांड सेंटर सब कुछ मौजूद था। वियतनामी सैनिक गुरिल्ला युद्ध के तरीके से इन सुरंगों के छोटे और छिपे हुए रास्तों से अचानक बाहर निकलकर अमेरिकी सैनिकों पर हमला करते थे और फिर पलक झपकते ही जमीन के नीचे गायब हो जाते थे। अमेरिकी सैनिकों को रोकने के लिए सुरंगों के दरवाजों और आस-पास बांस, लोहे की नुकीली कीलों और जहरीले तीरों से बने बेहद खतरनाक और जानलेवा जाल बिछाए जाते थे। इन सुरंगों को विशेष रूप से वियतनामी लोगों के छोटे कद के हिसाब से बेहद संकरा बनाया गया था, ताकि भारी-भरकम अमेरिकी सैनिक इनमें प्रवेश नहीं कर सकें। इस कू ची टनल को देखकर हम सब आश्चर्यचकित रह गए। यह टनल दुश्मनों के बम ब्लास्ट से बचने के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच था। यहाँ युद्धभूमि को जीवंत प्रस्तुत कर दिया गया था। अनेक स्त्री, पुरूष सैनिकों के माॅडल, अस्त्र-शस्त्र आदि युद्ध के समय के यहां रखे हुए थे। इस युद्धभूमि की पृष्ठभूमि में बम के फटने, मिसाईलों के चलने और बंदूके चलने की आवाजें भी आ रही थी। इससे यह पूरी युद्धभूमि जीवंत सी हो गई थी। हममें से कुछ यात्री 15 मीटर की लंबी सुरंग में झुककर और रेंगकर निकले तो पसीने में लथपथ हो गए थे। ऐसे में सैनिकों ने 21 वर्ष तक कैसे अमेरिका से टक्कर लेकर उसे परास्त किया होगा ? उनकी देशभक्ति को नमन। यहां छोटी-छोटी सुरंग में सैनिक के छिपने की जगह बनाई गई थी। यहां नीचे उतरकर सुरंग के ढक्कन पर घास-फूंस रख उसे अपने ऊपर रख ढक्कन को बंद करना होता था। हमारे कई सहयात्रियों ने यह सब किया। महिला यात्रियों में से श्रीमती झनक सोनाने ने भी नीचे उतरकर और ढक्कन बंद कर यह साहस कर दिखाया।
इंडियन रेस्टोरेंट बनारस में दोपहर भोजन
कू ची टनल से हम सब एयरपोर्ट के लिए निकले। रास्ते में इंडियन रेस्टोरेंट बनारस में शुद्ध शाकाहारी स्वादिष्ट दोपहर का भोजन किया। इसके साथ ही वहां स्वादिष्ट गोलगप्पे और गुलाबजामुन भी हमें मिले। हममें से अधिकतर ने गोलगप्पे बड़े चाव से खाए। यहां से हम फिर हो चि मिन्ह एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए। हमारी यात्रा अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रही थी। हनोई, क्रूज और सायगोन में कैसे सात दिन बीत गए, हमें पता ही नहीं चला। सभी एयरपोर्ट पहुंचकर एक दूसरे से विदा ले रहे थे और फिर मिलेंगे का वादा कर रहे थे। हम सब सहयात्रियों में से मध्यप्रदेश के अतिरिक्त उत्तरांचल, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, असम, छत्तीसगढ़, कर्नाटक आदि प्रान्तों से 50 यात्री इस वियतनाम की यात्रा में आए हुए थे। हममें से अधिकतर नागरिक वरिष्ठ नागरिक थे, किन्तु कुछ युवा भी थे। सबने अपने-अपने ढंग से यात्रा का आनंद लिया।
यातायात के नियमों का सख्ती से पालन वियतनाम की यात्रा के दौरान जो हमें एक खास बात देखने को मिली, वह थी वहां के लोगों द्वारा यातायात के नियमों का मन से पालन करना। कोई भी वाहन किसी को भी ओवरटेक करता हुआ दिखाई नहीं दिया। सब नियम से अपने-अपने वाहन एक के पीछे एक चलाते हुए देखे गए। चौराहे पर लाल बत्ती देखते ही सब रूक जाते थे और हरी बत्ती दिखने पर ही आगे बढते थे। आश्चर्य की बात तो यह थी कि किसी भी चौराहे पर कोई भी यातायात पुलिस हमें दिखाई नहीं दी। सब नियम से चलते दिखाई दिए। सभी दोपहिया वाहन चालक हेलमेट पहने ही दिखाई पड़ते थे। किसी भी वाहन को हमने हाॅर्न बजाते हुए नहीं सुना। पूरे वियतनाम में हमें रास्ते में कहीं भी कुत्ते, गाय, भैंस आदि दिखाई नहीं दिए। हमारे देश में तो इन्हीं को बचाने में अनेक बार दुर्घटना हो जाती है। न ही रास्ते में कोई बैंड बाजा, बारात, जुलूस, रैली आदि दिखाई दी। यह हम सब भारतवासियों के लिए आश्चर्य की बात थी ! वियतनाम के सभी यात्रियों की यातायात के नियमों का सख्ती से और मन से पालन करना हमें सबक सिखा गया।
सब चले अपने-अपने घर की ओर
एयरपोर्ट से शाम को रवाना होकर रात्रि करीब सवा 10 बजे हम दिल्ली एयरपोर्ट पहुंच गए थे। यहां से सब अपने-अपने बैग लेकर अपने-अपने शहर और घर की ओर निकले। उज्जैन से हम 9 साथी यात्रा में साथ गए थे। हममें से डाॅ. चन्द्र शर्मा और भाभी जी दिल्ली एयरपोर्ट पर ही रूककर वहां से इन्दौर हवाई जहाज से निकले। डाॅ. एस.एन पांडे और भाभी जी तथा डाॅ. मनीन्द्र व्यास और भाभी जी दिल्ली में ही रात्रि में अपने रिश्तेदार के यहां रूक गए। डाॅ. विनोद वैरागी, मैं और श्रीमती तीनों दिल्ली में होटल में रूकने वाले है, यह पता चलते ही हमारे सहयात्री श्री ललित मित्तल और भाभी जी ने हमें अपने ही होटल ग्रेंड प्लाजा में रूकने और खाने की व्यवस्था कर दी। उनका आभार तो बनता ही है। अगले दिन हम सब शाम की ट्रेन से उज्जैन के लिए निकले।
पहली बार की विदेश यात्रा
हम पति पत्नी ने अपने जीवन में नेपाल के बाद पहली बार विदेश वियतनाम की यात्रा की थी। इस विदेश की यात्रा कराने के लिए वर्ड्स आयुष फाउंडेशन के अध्यक्ष डाॅ. रंजन वर्मा विशद, विश्व हिन्दी मंच के डाॅ. प्रणव शास्त्री और इगनिटर वैकेशंस के प्रमुख आलोक जी का मन से अत्यन्त आभार। साथ ही आभार अपने सभी सहयात्रियों का, जिनके अपनत्व भरे व्यवहार ने हम सबकी यात्रा आनंदमय बना दी। इस प्रकार हम सबकी वियतनाम की सात दिवसीय यात्रा सानंद सम्पन्न हुई। (लेखक मध्य प्रदेश शासन के सेवानिवृत्त जनसंपर्क अधिकारी है)



