अंतरराष्ट्रीय

गोल्डन जुबली महोत्सव के समय के साक्षी बने हम सब

वीर सेनानियों की याद दिलाता वार मेमोरियल म्यूजियम

——  वियतनाम यात्रा संस्मरण -(2)  ——

-डाॅ. चन्दर सोनाने

वियतनाम की यात्रा के चौथे दिन 23 अप्रैल 2025 को सुबह 8 बजे नाश्ता करके और 12 बजे लंच करके हम सब 50 सहयात्री क्रूज से बाहर निकले। दोनों बस तैयार थी। हम सब अपनी-अपनी बसों में बैठे और हो चिमिन्ह की यात्रा के लिए निकले। रास्ता लंबा था। इसलिए रास्ते में हमारी बस में ही बैठे वर्ल्ड आयुष फाउंडेशन के अध्यक्ष और इस यात्रा के संयोजक डाॅ. रंजन वर्मा विशद ने मनोरंजन का रास्ता ढुंढ निकाला। उन्होंने अन्ताक्षरी का आयोजन कर और उसका संचालन किया। सबने उमंग और उत्साह से इसमें भाग लिया। इससे सबका खूब मनोरंजन हुआ और यात्रा की थकावट पता ही नहीं चली।

हजारों लाए थे लाखों खर्च किए

रास्ते में एक माॅल के सामने बस रूकी। वह माॅल अत्यन्त सुंदर आर्ट गैलरी से भरा हुआ था। वहां एक से बढ़कर एक सुंदर और आकर्षक कलाकृतियाँ हमने देखी। यही नहीं वहां बांस से बने कपड़े, हीरे-मोती और सोने-चाँदी के गहने खूबसूरत तरीके से बिक्री के लिए रखे हुए थे। अनेक ने खरीददारी भी की। यहाँ यह बताना जरूरी है कि हमारे देश भारत का एक रूपया वियतनाम की मुद्रा डोंग के 300 के बराबर था। वस्तु खरीदी में एक रुपए के 250 डोंग के हिसाब से विक्रय कर रहे थे। सभी यात्री अपने साथ हजारों रुपए लेकर आए थे और यात्रा के दौरान लाखों डोंग खर्च कर गए। यहाँ हुआ यूं कि सब यात्री अपने-अपने हिसाब से जैसे 50 हजार रुपए के बदले 1 करोड़ 25 लाख वियतनामी मुद्रा डोंग लेकर आए थे, सबने खुलकर खर्च किए। इस प्रकार भारत से हम यात्री लेकर चले थे हजारों रुपए, किन्तु खर्च किए लाखों। है न मजेदार बात।

इट इज अवर वियतनामी टाईम, नाॅट योर इंडियन टाईम
हमारी बस में एक गाइड था, जो अंग्रेजी में हमें उपयोगी और महत्वपूर्ण जानकारी देकर हमारी यात्रा को आनन्दमय बना रहा था। वह गाइड छोटे कद का गोल मटोल सुंदर सा युवक था। विश्व हिन्दी मंच के संयोजक और हमारे सहयात्री डाॅ. प्रवण शास्त्री उस गाइड को प्यार से आलू कहते थे। आलू का अर्थ पता नहीं होने के बावजूद जब भी उसे आलू कहकर पुकारा जाता तो वह मुस्कुरा देता और उसका आनन्द लेता था। इस प्रकार उसने पूरी यात्रा में न केवल हमारा मार्गदर्शन किया, बल्कि मनोरंजन भी किया। एक बार इसी आलू ने हमें समय का महत्व भी सिखाया। वे जब भी हमें रास्ते में जहां कही भी उतारते थे तो वह बताता था 25 मिनट में वापस आना है। 25 मिनट यानी 25 मिनट। इट इज अवर वियतनामी टाइम, नाॅट योर इंडियन टाईम। इस प्रकार उसने हमें समय के प्रति लापरवाह होने पर शर्मिंदा भी किया और समय का पाठ भी पढ़ाया। हम सब रात्रि में ही हो चिमिन्ह सिटी पहुंच गए और वहां रात्रि भोजन कर अपने-अपने कक्ष में विश्राम के लिए चले गए।

वार मेमोरियल म्यूजियम

वियतनाम का हो ची मिन्ह शहर एक प्रमुख व्यवसायिक और आधुनिक शहर है। इसकी आबादी करीब 10 लाख है। यात्रा के पांचवें दिन यानी अगले दिन 24 अप्रैल को सुबह हम सबने वार मेमोरियल म्यूजियम देखा। वियतनाम का सबसे प्रमुख युद्ध स्मारक संग्रहालय हो ची मिन्ह सिटी (साइगोन) में स्थित युद्ध अवशेष संग्रहालय है, जो वियतनाम युद्ध की विभीषिका और देश के संघर्षपूर्ण इतिहास को दर्शाता है। इस संग्रहालय की स्थापना वियतनाम युद्ध की समाप्ति के ठीक बाद सितंबर 1975 में की गई थी। शुरुआत में इसका नाम अमेरिकी और कठपुतली अपराधों का प्रदर्शनी भवन था। वर्ष 1995 में अमेरिका और वियतनाम के बीच राजनयिक संबंध सामान्य होने के बाद इसका नाम बदलकर युद्ध अवशेष संग्रहालय कर दिया गया, ताकि यह किसी एक देश की आलोचना के बजाय युद्ध के दुष्प्रभावों पर केंद्रित हो सके। यह संग्रहालय वियतनाम पर आक्रमण के दौरान हुए मानवाधिकार हनन, युद्ध अपराधों और तबाही के साक्ष्य प्रस्तुत करता है। यहाँ वियतनाम युद्ध में इस्तेमाल किए गए अमेरिकी विमान, टैंक, तोपें और बिना फटे बमों का विशाल संग्रह मौजूद है। यह स्थल दुनिया भर के लोगों को युद्ध की भयावहता से अवगत कराता है और भविष्य में शांति बनाए रखने की प्रेरणा देता है। इस वार म्यूजियम को देखकर हमें हमारे देश के अंडमान निकोबार स्थित जेल कालापानी की याद ताजा हो गई। इस जेल को सेलुलर जेल कहते हैं। वर्ष 2024 में हम में से अधिकतर ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह की यात्रा भी की थी। हमने वहां सेलुलर जेल को भी देखा था, जहां अंग्रेजों द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन के वीर जवानों को दी गई जघन्य यातनाओं का जीता जागता उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। उसे देखकर हमें अंग्रेजो से जिस प्रकार घृणा हो गई थी, उसी प्रकार हमारा मन अमेरिका द्वारा वियतनामियों को दी गई यातनाओं को देखकर भर आया। वियतनामी सरकार ने इस संग्रहालय को संजोकर अपने वीर सैनिकों को सच्ची श्रद्धांजलि दी है।

स्वतंत्रता महल

वार मेमोरियल म्यूजियम देखने के बाद हम सबने स्वतंत्रता महल देखा। इस स्वतंत्रता महल को जिसे पुनर्मिलन महल भी कहा जाता है, वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी में स्थित एक ऐतिहासिक और वास्तुशिल्प का महत्वपूर्ण प्रतीक है। इसे मूल रूप से 1868 में फ्रांसीसी द्वारा नरोडोम पैलेस के रूप में बनवाया गया था। 1962 में बमबारी के कारण पुराने भवन के क्षतिग्रस्त होने के बाद, इसे नए सिरे से डिजाइन किया गया और 1966 में इसका निर्माण पूरा हुआ। 30 अप्रैल 1975 को साइगोन के पतन के दौरान उत्तरी वियतनाम का एक टैंक इस महल के गेट को तोड़कर अंदर दाखिल हुआ था, जो वियतनाम युद्ध के अंत और देश के एकीकरण का ऐतिहासिक पल माना जाता है। इस भव्य इमारत में लगभग 100 कमरे हैं, जिनमें राष्ट्रपति का कार्यालय, कैबिनेट कक्ष, बेसमेंट, संचार केंद्र और छत पर एक हेलीपैड शामिल है। यह पूरा महल अत्यन्त आकर्षक और स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। इसे देखकर हम सबके मन में उस समय की स्थापत्य कला के प्रति आदर का भाव उत्पन्न हो गया।

आजादी की गोल्डन जुबली

स्वतंत्रता महल के सामने एक बड़ा सा मैदान है। यहीं पर वियतनाम अपनी आजादी की गोल्डन जुबली 22 से 30 अप्रैल 2025 के बीच मना रहा था। यहाँ हमने देखा बच्चे, बूढ़े और जवान सबके हाथ में वियतनाम का राष्ट्रीय ध्वज है । वे सब उत्साह और उमंग से भरे हैं। इन लोगों की देशभक्ति देखते ही बनती है। हम सब सहयात्री भी उन तैयारियों और उत्सव के समय के साक्षी बने, ये हमारा सौभाग्य रहा। उनकी तैयारियों का आलम यह था कि शाम को पूरा बाजार बंद हो जाता था, यहां तक की होटल भी बंद हो जाते थे। हमारे रात्रि के भोजन की व्यवस्था जिस रेस्टोरेंट में की गई थी, वह भी शाम के समय बंद हो गया था। इस कारण यात्रा के संयोजन सर्वश्री डाॅ. रंजन वर्मा, डाॅ. प्रणव शास्त्री और यात्रा के टीम मैनेजर श्री आलोक कुमार ने जैसे तैसे जुगाड़ कर भोजन का पैकेट उस होटल में बुलवाने की व्यवस्था की, जहां हम रात्रि में रूके थे। उस रात्रि हमें होटल की बजाय अपने अपने कमरों में ही भोजन के पार्सल से ही गुजारा करना पड़ा।

पोस्ट ऑफिस बनाम मार्केट

स्वतंत्रता महल देखने के बाद हमें एक पुराने पोस्ट ऑफिस ले जाया गया, जो वर्तमान में एक बहुत बड़ा मार्केट बना हुआ है। इसमें अनेक कलात्मक वस्तुएँ विक्रय के लिए रखी थी। एक ही जगह इतनी कलात्मक वस्तुओं को देखकर हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। इसके साथ ही हमें इस बात का भी अचरज हुआ कि बरसों पहले किस प्रकार इतना बड़ा पोस्ट ऑफिस अपना काम करता होगा ? इसे देखने के बाद हम सबने एक कैथोलिक चर्च को भी देखा। वह अत्यन्त साफ-सुथरा और दर्शनीय था। इन सबके भ्रमण के बाद हम सबने दोपहर का भोजन वहीं एक राजस्थानी भोजनालय में किया। विदेश में भारतीय भोजन मिलना अपने आप में एक सुखद आश्चर्य था। इसके बाद हम अपने होटल आ गए।

सेमिनार

रात्रि में होटल में हीवर्ड्स आयुष फाउंडेशन और विश्व हिन्दी मंच द्वारा एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह सेमिनार दो सत्रों में आयोजित किया गया था। इस संगोष्ठी का संचालन डाॅ. रंजन वर्मा ने आकर्षक रूप से किया। इस सेमिनार में हमारे अनेक साथियों ने विभन्न विषयों पर अपने-अपने सारगर्भित व्याख्यान दिए। सेमिनार के अंत में सभी यात्रियों को सेमिनार में भाग लेने के प्रमाणपत्र भी दिये गए। संगोष्ठी देर रात तक चली। उसके बाद सब अपने कक्ष में विश्राम के लिए चले गए। इस प्रकार हमारे 7 दिन की वियतनाम यात्रा में से 5 दिन की यात्रा सानंद सम्पन्न हुई।

(लेखक मध्य प्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग के सेवानिवृत्त जनसंपर्क अधिकारी है)

राजेंद्र पुरोहित

वरिष्ठ पत्रकार एवं Editor-in-Chief राजेंद्र पुरोहित पत्रकारिता के क्षेत्र में 40 से अधिक वर्षों का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने नईदुनिया, जागरण, अग्निबाण, सिटी चैनल और साधना न्यूज़ सहित प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्य किया है। मध्य प्रदेश के अधिमान्य पत्रकार राजेंद्र पुरोहित लोक वर्चस्व समाचार पत्र एवं lokvarchasva.in के संस्थापक और Editor-in-Chief हैं।

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