प्रदेश

मध्यप्रदेश के सरकारी 9 मेडिकल कॉलेज सरकार सौंप रही निजी हाथों में….!

592 करोड़ रूपए की लागत से उज्जैन में बन रहा मेडिकल कॉलेज भी शामिल

—————–सरोकार –—————
– डॉ. चंदर सोनाने
    केन्द्र और राज्य सरकार का दायित्व है कि वह आमजन को शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएँ उपलब्ध कराएँ। संविधान में भी इसका स्पष्ट उल्लेख है। इसके बावजूद मध्यप्रदेश में उल्टी गंगा बहाने की कोशिश की जा रही है। करीब 4 हजार करोड़ रूपए की लागत से मध्यप्रदेश के 9 सरकारी मेडिकल कॉलेजों को राज्य सरकार निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रही है। यही नहीं, उज्जैन में करीब 592 करोड़ रुपए की लागत से बनाए जा रहे भव्य मेडिकल कॉलेज को भी इसमें शामिल कर दिया गया है।
राज्य सरकार प्रदेश के इन 9 सरकारी मेडिकल कॉलेजों को पीपीपी ( पब्लिक-प्रायवेट पार्टनरशिप ) पर देने के अंतिम चरण में काम कर रही है। इन कॉलेजों में नीमच, सिंगरौली और श्योपुर के तीन मेडिकल कॉलेज भी शामिल है, जिन्हें राज्य सरकार दो साल से 100-100 सीटों के साथ चला रही है। यहाँ आमजन को अभी सस्ता ईलाज मिल रहा है।
इन 9 मेडिकल कॉजेलों में से नीमच, श्योपुर, सिंगरौली, मंडला और राजगढ़ के मेडिकल कॉलेज केन्द्र प्रवर्तित योजना के अन्तर्गत बनाए गए हैं। इनमें से हर एक कॉलेज के भवन पर औसत 325 करोड़ रूपए खर्च किए गए हैं। इस योजना में केन्द्र की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत और राज्य की 40 प्रतिशत है। यहाँ सवाल यह उठता है कि केन्द्र प्रवर्तित योजना के अन्तर्गत बनाए गए सरकारी मेडिकल कॉलेजों को राज्य सरकार क्या पीपीपी के तहत निजी हाथों में सौप सकती है ?
उक्त 9 मेडिकल कॉलेजों में से बुदनी, छतरपुर और दमोह के वे सरकारी मेडिकल कॉलेज भी हैं, जिसे पूरी तरह राज्य सरकार के खर्चे से बनाया गया है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि 2021 में उज्जैन मेडिकल कॉलेज को भी पीपीपी पर देने की राज्य सरकार द्वारा तैयारी की गई थी। किन्तु इसका चारों तरफ से घोर विरोध होने पर राज्य सरकार ने इस मसले को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। इसके बाद जब इस उज्जैन के मेडिकल कॉलेज को मंजूरी मिली तो उसे सरकारी कॉलेज के रूप में ही मंजूरी मिली थी। इस निर्माणाधीन सरकारी मेडिकल कॉलेज को भी अब पीपीपी मोड पर निजी हाथों में देने की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है।
प्रदेश के 9 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भवन, मशीनें, फर्नीचर और अन्य समस्त सुविधाएँ मिलाकर करीब 4 हजार करोड़ रूपए की लागत आती है। इस प्रकार इतनी बड़ी राशि के सरकारी मेडिकल कॉलेजों को पीपीपी पर देने की तैयारी आमजन की समझ से परे है। राज्य सरकार किसके दबाव में इन सरकारी मेडिकल कॉलेजों को निजी हाथों में सौंपने जा रही है ? यह प्रश्न आमजन के मन में कौंध रहा है।
यही नहीं, राज्य सरकार प्रदेश के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों (सीएचसी) को भी निजी हाथों में सौंपने की लगभग तैयारी पूरी कर चुकी है। इनमें से रीवा के 8, देवास के 4 और गुना के 6 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र है। मेडिकल कॉलेजों के साथ ही ग्रामीणों को अपने क्षेत्र में ही स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को भी निजी हाथों में सौंपने का मकसद क्या हो सकता है ?
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के ही आदिवासी बहुल जिले बालाघाट में पिछले दिनों स्वास्थ्य विभाग की नाकारी के कारण 32 आदिवासी बच्चों की अकाल मृत्यु हो चुकी है। बालाघाट जिले के बैगा बहुल इलाकों में इन आदिवासी बच्चों की मौत हो गई है। मीडिया में यह खबर जोर-शोर से आने के बाद सरकार ने क्षेत्र में उपचार की व्यवस्था तो की है, किन्तु सवाल यहाँ यह है कि इन 32 आदिवासी बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन है ? इन बच्चों की मौत पर राज्य सरकार ने वरिष्ठ अधिकारियों से जांच क्यों नहीं कराई ? दोषी व्यक्तियों के विरूद्ध क्या कार्रवाई की गई ? ये प्रश्न अभी तक निरूत्तर है !
आदिवासी बहुल बालाघाट जिले के बैगा बहुल इलाकों में बच्चों की बीमारी और मौत अनेक सवाल खड़े कर रहा है। ऐसी हालत में जब वर्तमान सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं ही नकारा साबित हो रही है तो इस सरकारी मेडिकल कॉलेजों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को निजी हाथों में सौंपने के क्या परिणाम होंगे ? यह सर्वविदित सत्य है कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में आमजनों का निःशुल्क ईलाज, जाँच और दवाईयां आदि दी जाती है। ऐसी स्थिति में जब ये भी निजी हाथों में सौंप दिए जायेंगे तो आमजन का भगवान हर मालिक है ! यह भी सत्य है कि निजी अस्पताल लूट के अड्डे बन चुके हैं। यहाँ आमजन की कोई सुनवाई नहीं होती।
प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव विकास पुरूष के रूप में प्रदेश में जाने जाते हैं। उन्हें चाहिए कि वे ये देखें कि स्वास्थ्य विभाग में क्या गोरखधंधा होने जा रहा है ? अभी भी समय है, सरकारी मेडिकल कॉलेजों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को निजी हाथों में सौंपने पर नियंत्रण किया जा सकता है। मुख्यमंत्री ये सोचें और प्रदेश की आम जनता को सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित नहीं करें !

(लेखक मध्य प्रदेश शासन के सेवानिवृत्त जनसंपर्क अधिकारी है)

राजेंद्र पुरोहित

वरिष्ठ पत्रकार एवं Editor-in-Chief राजेंद्र पुरोहित पत्रकारिता के क्षेत्र में 40 से अधिक वर्षों का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने नईदुनिया, जागरण, अग्निबाण, सिटी चैनल और साधना न्यूज़ सहित प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कार्य किया है। मध्य प्रदेश के अधिमान्य पत्रकार राजेंद्र पुरोहित लोक वर्चस्व समाचार पत्र एवं lokvarchasva.in के संस्थापक और Editor-in-Chief हैं।

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