दुनिया : जैसा मैं देखती हूँ……17 वर्षीय ईशा गोयल की कैमरे से दुनिया तक की यात्रा

(मुम्बई से शामी एम इरफ़ान की रिपोर्ट)
मुंबई। तस्वीरों से भरी इस डिजिटल दुनिया में, जहाँ छवियाँ बनती हैं और पलक झपकते ही स्क्रीन पर आगे बढ़ जाती हैं, सिएटल की 17 वर्षीय ईशा गोयल ने देखने का एक धीमा और आत्मीय रास्ता चुना है—कैमरा। पाँच वर्ष की उम्र में एक बेसिक कैमरे से शुरू हुआ यह सिलसिला अब सात वर्षों से DSLR तक पहुँच चुका है। मुंबई में आयोजित उनकी पहली एकल प्रदर्शनी ‘दुनिया : जैसा मैं देखती हूँ’ इसी विकसित होती दृष्टि की झलक प्रस्तुत करती है।
ईशा का जन्म डेलावेयर, अमेरिका में हुआ। उनके माता-पिता पहले ईस्ट कोस्ट और पिछले 16 वर्षों से वॉशिंगटन स्टेट के सिएटल में कार्यरत हैं। सामामिश उपनगर के स्काईलाइन स्कूल में बारहवीं की छात्रा ईशा के लिए फोटोग्राफी पढ़ाई के साथ चलने वाला कोई सामान्य शौक भर नहीं है। यह उनके लिए दुनिया को देखने और अनुभवों को संजोने का माध्यम बन चुका है।
उनकी तस्वीरों में इस दृष्टि का विस्तार साफ दिखाई देता है। हवाई, अलास्का, न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन डीसी, अटलांटा, कोस्टारिका, मेक्सिको, फ्रांस, भारत, इंग्लैंड और स्कॉटलैंड की यात्राओं ने उन्हें अलग-अलग भू-दृश्यों, शहरों और संस्कृतियों से रूबरू कराया। वहीं आइस स्केटिंग के प्रति उनका जुनून उन्हें कनाडा और स्विट्जरलैंड के बर्फीले इलाकों तक ले गया। हर यात्रा ने उनके कैमरे को एक नया दृश्य और उनकी आँखों को देखने का नया कोण दिया।
ईशा के फ्रेम की पहली खासियत उसका पैमाना है। विस्तृत क्षितिज, नाटकीय आकाश, स्थापत्य की भव्यता और निम्न कोणों का प्रभावशाली इस्तेमाल उनकी तस्वीरों को दृश्यात्मक गहराई देता है। पहाड़ हों या स्मारक, महानगर हों या जंगल—उनके कैमरे में आते ही ये महज स्थानों की तस्वीरें नहीं रह जाते, बल्कि एक दृश्य कथा का हिस्सा बन जाते हैं।
लेकिन उनकी निगाह केवल भव्य दृश्यों पर नहीं ठहरती। बाँस का झुरमुट, चेरी के पेड़ों के रंग, टोक्यो की रात की रोशनियाँ या पेड़ों के बीच से छनती सुनहरी धूप जैसे साधारण क्षण भी उनके लिए तस्वीर का विषय बन जाते हैं। यही सहज कौतूहल उनकी फोटोग्राफी को महज यात्रा-वृत्तांत बनने से बचाता है।
ईशा की तस्वीरों में एक तरह का ठहराव है। वह किसी दृश्य को सिर्फ दर्ज नहीं करतीं, बल्कि उसे देखने के लिए समय देती हैं। प्रकाश, रंग, संरचना और गहराई के प्रति उनकी सजगता के साथ उनकी उम्र की वह जिज्ञासा भी दिखाई देती है, जो दुनिया को अभी पूरी तरह परिचित नहीं मानती।
प्रदर्शनी के क्यूरेटर और FTII से जुड़े निर्देशक-छायाकार आदि ठाकुर के मार्गदर्शन में प्रस्तुत यह संग्रह इसी उभरती हुई दृष्टि को सामने लाता है। तस्वीरों को देखते हुए लगता है कि यात्रा ने ईशा को केवल नए स्थान नहीं दिए; उसने उनकी देखने की भाषा भी बदली है। किसी पहाड़ी पर पड़ती रोशनी, किसी शहर का रात में बदलता चेहरा या दूर तक जाती सड़क—ये अनुभव उनकी स्मृति में रहकर बाद में फ्रेम का हिस्सा बनते दिखाई देते हैं।
दिलचस्प यह भी है कि ईशा का रचनात्मक संसार कैमरे तक सीमित नहीं है। गणित उनका प्रिय विषय है और पढ़ाई से थकने पर वह पियानो पर शास्त्रीय संगीत बजाती हैं। संख्याओं की तार्किकता, संगीत की लय और फोटोग्राफी में प्रकाश-संरचना—तीनों अलग-अलग माध्यम हैं, लेकिन शायद इन्हीं के बीच उनकी संवेदनशीलता अपना आकार ले रही है।
‘दुनिया : जैसा मैं देखती हूँ’ को केवल एक किशोर फोटोग्राफर की यात्राओं का संग्रह मानना इसलिए पर्याप्त नहीं होगा। ये तस्वीरें एक बनती हुई दृष्टि का दस्तावेज हैं। इनमें दुनिया को देखने के साथ-साथ उसे अपने भीतर दर्ज करने की कोशिश भी है।
आज, जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक कुछ ही क्षणों में असंख्य छवियाँ बना सकती हैं, ईशा का कैमरे के साथ यह रिश्ता एक अलग तरह की संवेदना की याद दिलाता है—देखना, ठहरना और फिर किसी क्षण को अपने लिए अर्थपूर्ण पाना।
शायद एक फोटोग्राफर का जन्म कैमरा हाथ में लेने से पहले ही हो जाता है—उस जिज्ञासा में, जो किसी दृश्य के सामने रुकती है और पूछती है कि इसे बाकी लोग जिस तरह देखते हैं, क्या मैं इसे उससे अलग देख सकती हूँ?
ईशा गोयल की तस्वीरें इसी प्रश्न से निकलती हुई दिखाई देती हैं।
दुनिया उनकी आँखों के सामने बदल रही है—और उसी के साथ, उनकी आँखें भी दुनिया को देखते हुए अपना आकार ले रही हैं।