900 करोड़ खर्च के बाद भी शिप्रा में मिल रहा फैक्ट्रियों का जहरीला पानी और सीवेज

उज्जैन। सिंहस्थ 2028 से पहले शिप्रा नदी के शुद्धिकरण को लेकर चल रहे 900 करोड़ रुपए से अधिक के प्रोजेक्ट के बावजूद नदी में गंदे नालों और फैक्ट्रियों का जहरीला पानी लगातार मिल रहा है। स्थानीय अखाड़ा परिषद अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर दास ने देवास की फैक्ट्रियों और त्रिवेणी से गऊघाट तक के होटलों का सीवेज शिप्रा में मिलने पर अधिकारियों व नगर निगम की मिलीभगत के आरोप लगाए हैं। प्रदूषण को लेकर साधु-संतों में भारी आक्रोश है और जल्द ही अखाड़ा परिषद बैठक कर कठोर निर्णय ले सकता है।
अखाड़ा परिषद अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर दास ने साधु-संतों के साथ शिप्रा के घाटों और देवास का दौरा किया। उन्होंने बताया कि स्थानीय अधिकारियों की फैक्ट्री संचालकों से मिलीभगत के कारण फैक्ट्रियों का जहरीला पानी शिप्रा में प्रवाहित हो रहा है। एक ओर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सिंहस्थ के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर लापरवाही के कारण शिप्रा प्रदूषण मुक्त नहीं हो पा रही है। एनजीटी ने भी शिप्रा में मिल रहे गंदे नालों को लेकर अधिकारियों पर तीखे सवाल किए हैं।
-अखाड़ा परिषद ने लगाए मिलीभगत के आरोप
डायवर्जन परियोजना भी सवालों के घेरे में
कान्ह नदी के प्रदूषित पानी को रोकने के लिए 919.94 करोड़ रुपए की कान्ह डायवर्जन क्लोज डक्ट परियोजना पर काम चल रहा है। इसमें 30.15 किलोमीटर लंबी प्रणाली से प्रदूषित पानी डायवर्ट किया जाना है। जून 2026 में मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री ने इसका निरीक्षण भी किया था, लेकिन शहर के हाटकेश्वर, पीलियाखाल और भैरवगढ़ नाले अभी तक नहीं रोके जा सके हैं।
अखाड़ा परिषद और जिम्मेदारों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल उठाए हैं। यह पूछा गया है कि शिप्रा में मिलने वाले सभी नालों को तत्काल पूरी तरह टैप क्यों नहीं किया गया और हाटकेश्वर, पीलियाखाल व भैरवगढ़ नाले शिप्रा तक पहुंचने से क्यों नहीं रोके गए। करोड़ों की योजनाओं के बावजूद सीवेज की समस्या कायम क्यों है और नालों की मॉनिटरिंग व एसटीपी व्यवस्था की जिम्मेदारी किस विभाग की है। प्रशासन को केवल दावे करने के बजाय सिंहस्थ से पहले शिप्रा को प्रदूषण मुक्त करने की स्पष्ट और समयबद्ध कार्ययोजना सार्वजनिक करनी चाहिए।
होटल संचालकों से क्या है मिलीभगत
अखाड़ा परिषद अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर दास ने खुले रूप से मिलीभगत के आरोप लगाते हुए कहा कि त्रिवेणी से लेकर गऊघाट तक शिप्रा नदी किनारे कई बड़े होटल बने हैं। इन होटलों के सीवेज का पानी भी सीधे शिप्रा में ही मिल रहा है। इसके बावजूद नगर निगम कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि सब कुछ सामने होने के बाद भी निगम प्रशासन आखिर क्या देख रहा है।



