देश

अखाड़ों में हावी हुई पदलोलुपता की राजनीति, संतों के विवादों से सनातन धर्म को नुकसान…

-अखिल भारतीय पुजारी महासंघ का अखाड़ा परिषद पर निशाना, कहा- धर्म के लिए केवल शंकराचार्य का वचन ही मान्य

उज्जैन। देश के अखाड़ों में अब राजनीतिक दलों जैसी गठजोड़ और गुटबाजी की राजनीति हावी हो गई है। संतों में बढ़ती पद और प्रतिष्ठा की लोलुपता के कारण सनातन धर्म को भारी नुकसान हो रहा है। अखिल भारतीय पुजारी महासंघ ने अखाड़ा परिषद की वर्तमान कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि सनातन धर्म के लिए अब अखाड़ों की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है, धर्म के लिए केवल सर्वोच्च धर्माधिकारी शंकराचार्य का वचन ही मान्य होना चाहिए।अखिल भारतीय पुजारी महासंघ के राष्ट्रीय सचिव रूपेश मेहता ने बताया कि जिस तरह राजनीतिक दल चुनाव के समय एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगाते हैं और सत्ता हासिल करने के लिए बाद में गठबंधन कर लेते हैं, ठीक वैसा ही नजारा इन दिनों अखाड़ा परिषद में दिखाई दे रहा है। जो लोग कुछ समय पहले तक एक-दूसरे का कड़ा विरोध कर रहे थे, वे आज पद और प्रतिष्ठा की लालसा में एक-दूसरे का समर्थन करते नजर आ रहे हैं।

अखिल भारतीय पुजारी महासंघ के राष्ट्रीय सचिव रूपेश मेहता ने बताया कि जिस तरह राजनीतिक दल चुनाव के समय एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगाते हैं और सत्ता हासिल करने के लिए बाद में गठबंधन कर लेते हैं, ठीक वैसा ही नजारा इन दिनों अखाड़ा परिषद में दिखाई दे रहा है। जो लोग कुछ समय पहले तक एक-दूसरे का कड़ा विरोध कर रहे थे, वे आज पद और प्रतिष्ठा की लालसा में एक-दूसरे का समर्थन करते नजर आ रहे हैं।

निर्मोही अखाड़े के यू-टर्न पर उठाए सवाल

महासंघ ने अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पद को लेकर चल रहे विवाद का हवाला देते हुए बताया कि चार महीने पहले निर्मोही अणि अखाड़े ने निरंजनी अखाड़ा के सचिव रवींद्रपुरी को अध्यक्ष मानने से साफ इनकार कर दिया था। अब उसी निर्मोही अखाड़े ने अपने रुख में बदलाव करते हुए रवींद्रपुरी का समर्थन कर दिया है। संतों के बीच हो रही इस राजनीतिक स्तर की तोड़फोड़ से अखाड़ा परिषद की कार्यप्रणाली की सच्चाई सनातन धर्मावलंबियों के सामने आ गई है।

शंकराचार्य ही धर्म के सर्वोच्च अधिकारी

पुजारी महासंघ ने चिंता जताते हुए कहा कि संतों में बढ़ती यह अवसरवादिता और राजनीति सनातन धर्म को रसातल में ले जा रही है। यदि धर्म की रक्षा करनी है, तो समाज को ऐसे लोगों से सावधान रहना होगा। देश में सनातन धर्म का मार्गदर्शन करने और उसे सुचारू रूप से चलाने के लिए सर्वोच्च धर्माधिकारी शंकराचार्य ही पर्याप्त हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button