ऊर्जा का उर्ध्वमुखी रूपांतरण

-आचार्य पदम
1/ गुरुत्व बल के सिद्धांत को तोड़कर ऊर्जा को अधोमुखी से ऊर्ध्वमुखी की ओर मोड़ने के लिए सर्वप्रथम अपनी अतीन्द्रिय शक्ति का विस्तार करना आवश्यक है।
इसके लिए सबसे पहले चित्त को हर ऐसे विषय से आज़ाद करना होगा, जो उसे चंचल बनाते हैं, तथा प्राण शक्ति का निरंतर ह्रास करते हैं।
2/. मूलाधार चक्र और बुद्धि का विकास।
मूलाधार चक्र में स्थित शक्ति के अधिष्ठाता देव गणेश हैं, जो बुद्धि के प्रतीक और बुद्धि प्रदान करने वाले हैं।
- इसी बुद्धि के सहारे व्यक्ति अपने भीतर की हर नकारात्मक शक्ति और नश्वर विषय का त्याग कर सकता है।
- इसके माध्यम से चित्त को भ्रम से मुक्त किया जा सकता है।
- बुद्धि का विकास तभी संभव है जब चित्त की चंचलता समाप्त हो, जिससे भ्रम और माया से दूरी बनने लगती है। चित्त उन तमाम भ्रमों से मुक्त होने लगता है जिनके साथ वह पहले एकाकार था और बिना रुके दौड़ रहा था।
3/ . माया रक्षक और तमस का प्रभाव।
मूलाधार में स्थित जो शक्ति तमस की सूचक है, वह डाकिनी स्वरूप होती है। यह उस परम और मूल शक्ति के लिए माया रक्षक की तरह कार्य करती है।
- जो व्यक्ति केवल भौतिक, सांसारिक और नश्वर विषयों की प्राप्ति के लिए अनैतिक से अनैतिक कर्म करने को तत्पर रहते हैं, वे असत्य, अज्ञानता, भ्रम और अप्राकृतिक आवरण को धारण किए रहते हैं।
- जब तक मनुष्य ऐसे आवरण से बंधा रहता है और केवल भौतिक सत्ता की प्राप्ति के लिए नैतिक-अनैतिक सीमाओं का उल्लंघन करता है, तब तक उसका चित्त चंचल बना रहता है।
- यह शक्ति प्राण और कुंडलिनी को निरंतर नीचे की ओर खींचे रखती है, जब तक प्राणी तमस स्वरूप में ढलकर मानवता और प्रकृति के सिद्धांतों के विरुद्ध कार्य करता है।
4/ . पाताल भैरवी और लोक का बंधन।
दानवीय अवगुणों से परिपूर्ण मनुष्य अपनी प्राण शक्ति का ह्रास करके मृत्यु उपरांत उसी लोक में बंध जाता है, जिसके अनुरूप उसने अपना जीवन नष्ट किया होता है।
- इन्हें पाताल भैरवी के रूप में भी जाना जाता है।
- जब तक मानव बनकर दानव स्वरूप कर्म और गुण धारण किए रहेंगे, तब तक ये शक्तियाँ आपको उसी लोक में फँसाए रखेंगी।
- मनुष्य बार-बार जन्म लेकर भी सांसारिक भोग-विवाद और भौतिक विषयों में इस प्रकार उलझा रहता है कि आत्मिक विकास की ओर कभी ध्यान ही नहीं दे पाता।
परिणामस्वरूप, जीव केवल जीव योनि तक ही सीमित रह जाता है; वह अपने आत्मिक स्वरूप को न तो जान पाता है और न ही धारण कर पाता है, जिससे उसकी वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा कभी प्रारंभ ही नहीं हो पाती।
-आचार्य पदम ज्योतिषाचार्य, नई दिल्ली

