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सरकारी संजीवनी क्लीनिक में फर्जी डाॅक्टर: इनका हो इलाज



डाॅ. चन्दर सोनाने
यह सर्वज्ञात सत्य है कि सरकारी अस्पतालों और क्लीनिक में गरीब लोग ही बीमार पड़ने पर ईलाज के लिए जाते हैं। कुछ समय पहले मध्यप्रदेश में सरकारी संजीवनी क्लीनिक खोले गए हैं। यदि इन सरकारी क्लीनिक में डाॅक्टर ही फर्जी हो तो मरीज का तो भगवान ही मालिक है!
ऐसा ही मामला मध्यप्रदेश में आया है, जिसमें कुछ फर्जी डाॅक्टरों ने फर्जी डिग्री, फर्जी मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन या दूसरे डाॅक्टरों के पंजीयन नम्बर के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल कर ली। कुछ ने दूसरे डाॅक्टर का रजिस्ट्रेशन नम्बर इस्तेमाल कर लिया तो किसी का पंजीयन नम्बर मेडिकल काउंसिल के रिकाॅर्ड में ही मौजूद नहीं मिला।
यह एक सामान्य परिपाटी है कि सरकारी क्लीनिक हो या आॅफिस हो, उसमें किसी भी पद पर किसी का चयन होता है तो ज्वाईनिंग के समय उनके रिकाॅर्ड का सत्यापन किया जाता है। किन्तु यहां सत्यापन ही सही तरीके से नहीं किया गया या जानबूझकर अनदेखा किया गया !
सरकारी संजीवनी क्लिीनिक में कुछ फर्जी डाॅक्टरों के उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है, जिसे देखकर आश्चर्य और दुख होता है। डाॅक्टरी पेशे को ऐसे लोगों ने कलंकित कर दिया है। विदिशा के गंज बासौदा में पदस्थ मुकेश जाटव ने डाॅ. कुशवेन्द्र सिंह का पंजीयन नम्बर इस्तेमाल कर लिया। मार्कशीट में एक ही फाॅन्ट का उपयोग पाया गया है। जाँच में रजिस्ट्रेशन और मार्कशीट फोटोशाॅप से तैयार होना पाया गया। इसी प्रकार आकाश चन्देलकर शिवपुरी में पदस्थ थे। इनके दस्तावेजों की जाँच में पंजीयन नम्बर का जो उपयोग किया गया वह रिकाॅर्ड में मिला ही नहीं।
बुद्धमान भिंड में नियुक्त किए गए। जाँच में एमसीआई पंजीयन फर्जी मिला। इसी प्रकार ओंकार सिंह गुर्जर मुरैना में पदस्थ थे। जाँच में इनकी डिग्री और रजिस्ट्रेशन में एमबीबीएस पास होने का साल 2022 लिखा था, जबकि मार्कशीट और इन्टर्नशिप रिकाॅर्ड में 2018-19 पाई गई। जाँच में डिग्री परीक्षा पास करने से 2 साल पहले जारी होना पाई गई। डेढ़ माह की इन्टर्नशिप को 1 वर्ष की जरूरी रोटेटरी इन्टर्नशिप बताया गया। इसी तरह मुरैना के ही हरेन्द्र सिंह दिनकर की मार्कशीट में विषयवार अंकांे का योग और कुल अंक ही मेल नहीं खा रहे। मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन का कोई रिकाॅर्ड ही नहीं पाया गया।
इसी प्रकार बैतूल के संजीवनी क्लीनिक में पदस्थ मोनिका सोनी के दस्तावेजो में एमसीआई पंजीयन क्रमांक उनके नाम पर दर्शाया गया, जबकि यह नम्बर डाॅ. विभा खुराना का है। गंजबासौदा में पदस्थ मुकेश कुमार ने डाॅ. सचिन शिंदे का एमसीआई पंजीयन इस्तेमाल किया। इन महाशय के रजिस्ट्रेशन और मार्कशीट दोनों एआई की मदद से तैयार होना पाया गया। शिवपुरी मंे पदस्थ मोहर सिंह का एमबीबीएस में पास होना नवम्बर-दिसम्बर 2018 में बताया गया। डिग्री 20 जनवरी 2018 की जारी दिखाई दी। अर्थात परीक्षा से 10 महीने पहले इनका पास होना पाया गया। इनका रजिस्ट्रेशन नम्बर और कोई रिकाॅर्ड ही नहीं पाया गया।
उक्त फर्जी डाॅक्टर किस तरह से उनके यहाँ आए मरीजों का इलाज करते थे, इसका भी खुलासा हुआ है। दमोह के सरकारी संजीवनी क्लीनिक की दीवार पर तीन तरह के पर्चे चिपके हुए मिले। इन पर्चों में वजन के हिसाब से बुखार, सर्दी, खाँसी आदि की डोज लिखी पाई गई। हर बीमारी में एक ही तरह की दवा दी जा रही थी। क्लीनिक की दीवार पर चिपके पर्चों में पैरासिटामोल, एमोक्सीसिलिन और सिट्राजिन जैसी दवाईयों का डोज उम्र और वजन के हिसाब लिखी हुई थी। यहाँ पदस्थ फर्जी डाॅक्टर सचिन यादव इन्हीं पर्चों को देकर मरीजों का ईलाज करता था।

                      –सरोकार-
फर्जी डाॅक्टरों के विरूद्ध मध्यप्रदेश में जो जाँच की गई। उसकी भनक मिलने पर कुछ डाॅक्टर इस्तीफा देकर चले गए और कुछ डाॅक्टरों ने क्लीनिक आना ही बंद कर दिया। ऐसे इस्तीफा देने वाले और गायब हो जाने वाले फर्जी डाॅक्टरों के दस्तावेजों का भी परीक्षण कर उन्हें सख्त सजा दी जानी चाहिए।
राज्य शासन को चाहिए कि गरीबों को सस्ता और सही ईलाज सरकारी संजीवनी क्लीनिक में मिले, इसके लिए प्रदेश के सभी सरकारी संजीवनी क्लीनिक में पदस्थ डाॅक्टरों की डिग्री की जाँच का अभियान शुरू करें। जाँच में दोषी पाए जाने वाले इन फर्जी डाॅक्टरों के विरूद्ध न केवल एफआईआर दर्ज की जाए, बल्कि इनके विरूद्ध इंसानों की जान से खिलवाड़ करने के आरोप भी दर्ज किए जाए। मध्यप्रदेश में संविदा पर भी डाॅक्टरों की नियुक्ति की जा रही है और की गई है। संविदा में पदस्थ डाॅक्टर भी फर्जी नहीं मिले, इसके लिए उनके समस्त दस्तावेजों का गहन जाँच की जाए और दोषी पाए जाने पर उन्हें भी सख्त दंड दिया जाना चाहिए। हाल ही में एक अच्छी खबर आई है, वह यह कि राज्य शासन ने प्रदेश में पदस्थ किए जाने वाले संविदा डाॅक्टरों के दस्तावेजों, डिग्री आदि के जाँच के आदेश दे दिए है। जाँच को सर्वोच्च प्राथमिकता पर लिए जाने की आवश्यकता है, ताकि सरकारी संजीवनी क्लीनिक की विश्वसनीयता पर कोई आँच ना आने पाए।

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