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एक उम्र के बाद बुजुर्गों को वाहन चलाना बंद करना चाहिए…

-अश्विन चोपड़ा, उज्जैन

भारत में सड़क हादसों की बढ़ती संख्या और बदलती यातायात परिस्थितियों के बीच एक महत्वपूर्ण बहस तेजी से सामने आ रही है-क्या एक निश्चित उम्र के बाद बुजुर्गों को वाहन चलाने से रोक दिया जाना चाहिए? यह सवाल केवल सुरक्षा का नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता, स्वतंत्रता और जिम्मेदारी से भी जुड़ा हुआ है।

आज देश में बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक दोपहिया और चारपहिया वाहन चला रहे हैं। कई बुजुर्ग पूरी तरह स्वस्थ, सजग और अनुभवी चालक होते हैं, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ शरीर और दिमाग की कार्यक्षमता में स्वाभाविक बदलाव
आने लगते हैं। ऐसे में सड़क सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सरकार द्वारा कोई स्पष्ट नीति बनाए जाने की मांग उठ रही है।
उम्र बढ़ने के साथ घटती हैं शारीरिक क्षमताएं- विशेषज्ञों के अनुसार 65 से 70 वर्ष की आयु के बाद व्यक्ति की दृष्टि, सुनने की क्षमता, प्रतिक्रिया समय और संतुलन प्रभावित होने लगता है। रात में कम दिखाई देना, अचानक ब्रेक लगाने देरी, ट्रैफिक संकेतों को समझने में समय लगना और लंबी दूरी तक ध्यान केंद्रित रखने में कठिनाई जैसी समस्याएं सामने आती हैं।
यही कारण है कि कई बार बुजुर्ग चालक अनजाने में दुर्घटनाओं का कारण बन जाते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि हर वरिष्ठ नागरिक असुरक्षित चालक होता है, लेकिन जोखिम बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। विदेशों में हैं सख्त नियम दुनिया के कई देशों में बुजुर्ग चालकों के लिए विशेष नियम बनाए गए हैं। कुछ देशों में एक निश्चित उम्र के बाद ड्राइविंग लाइसेंस का नवीनीकरण हर वर्ष कराया जाता है, जिसमें मेडिकल टेस्ट और दृष्टि परीक्षण अनिवार्य होते हैं। कहीं-कहीं मानसिक स्वास्थ्य और प्रतिक्रिया क्षमता की भी जांच की जाती है। भारत में फिलहाल ड्राइविंग लाइसेंस नवीनीकरण की प्रक्रिया तो है, लेकिन वह अधिकतर औपचारिक बनकर रह गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कागजी प्रक्रिया के बजाय वास्तविक स्वास्थ्य परीक्षण जरूरी होना चाहिए।
इस क्या सरकार तय करे अधिकतम आयु सीमा? मुद्दे पर समाज दो हिस्सों में बंटा दिखाई देता है। एक वर्ग मानता है कि सरकार को 75 या 80 वर्ष की अधिकतम आयु सीमा तय कर देनी चाहिए, जिसके बाद व्यक्ति वाहन न चला सके। उनका तर्क है कि इससे सड़क हादसों में कमी आएगी और आम नागरिकों की सुरक्षा बढ़ेगी।

वहीं दूसरा वर्ग इसे बुजुर्गों की स्वतंत्रता पर हमला मानता है। उनका कहना है कि केवल उम्र के आधार पर किसी को अयोग्य घोषित करना गलत होगा। कई बुजुर्ग 80 वर्ष की उम्र में भी पूरी तरह फिट और सतर्क होते हैं, जबकि कुछ लोग कम उम्र में भी सुरक्षित ड्राइविंग के योग्य नहीं रहते।

समाधान प्रतिबंध नहीं

विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय नियमित मेडिकल फिटनेस टेस्ट बेहतर विकल्प हो सकता है। यदि किसी वरिष्ठ नागरिक की आंखें, मानसिक स्थिति और प्रतिक्रिया क्षमता सामान्य है तो उसे वाहन चलाने की अनुमति मिलनी चाहिए। इसके अलावा बुजुर्ग चालकों के लिए सीमित दूरी, दिन के समय ड्राइविंग और हाईवे पर विशेष सावधानी जैसे नियम भी बनाए जा सकते हैं।

परिवार और समाज की भी जिम्मेदारी कई बार परिवार के लोग भावनाओं के कारण बुजुर्गों को वाहन चलाने से नहीं रोकते, जबकि
उन्हें पता होता है कि उनकी प्रतिक्रिया क्षमता पहले जैसी नहीं रही। ऐसे में परिवार को संवेदनशीलता के साथ समझदारी भी दिखानी होगी।
यदि किसी बुजुर्ग को चलने-फिरने या देखने में परेशानी हो रही है, तो परिवार को उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध करानी चाहिए ताकि उनकी सुरक्षा और आत्मसम्मान दोनों बने रहें।

संतुलित नीति की जरूरत-यह विषय केवल कानून बनाने का नहीं, बल्कि संवेदनशील संतुलन बनाने का है। सरकार को सड़क सुरक्षा और वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान दोनों को ध्यान में रखकर नीति तैयार करनी चाहिए। उम्र आधारित पूर्ण प्रतिबंध के बजाय स्वास्थ्य आधारित मूल्यांकन अधिक व्यावहारिक और न्यायसंगत समाधान माना जा सकता है।
समय के साथ सड़कें व्यस्त और तेज हो रही हैं। ऐसे में सुरक्षित यातायात व्यवस्था के लिए यह बहस अब गंभीर नीति-निर्माण का विषय बन चुकी है।

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